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Wednesday, December 5, 2018

सिकंदर का सेनापति

एक बार सिंकदर किसी कारण से अपने सेनापति से नाराज हो गया। उसने उसे सूबेदार बना दिया। सिकंदर ने सोचा कि इतने छोटे पद पर आने से उसका सेनापति अपमानित महसूस करेगा और घुल-घुलकर मर जाएगा।

एक दिन उसने सेनापति को बुलवाया ताकि यह देख सके कि उसकी क्या हालत है। लेकिन सिकंदर ने जो सोचा था उसका उलटा ही हुआ। सेनापति तो पहले से भी ज्यादा स्वस्थ और प्रसन्न दिखाई दे रहा था। सिकंदर हैरान रह गया। 

उसने उससे पूछा- तुम इतना खुश कैसे दिखाई दे रहे हो? सेनापति से सूबेदार बनने का तुम्हें कोई दुख नहीं है? 

सेनापति ने कहा- बिल्कुल नहीं। पहले जब मैं सेनापति था तो सैनिक मुझसे बात करने से कतराते थे। मैं भी अपने पद की मर्यादा का ध्यान रखकर उनसे बात करने से कतराता था। पर अब तो कोई संकोच रहा ही नहीं। 
अब मैं उनसे खुलकर बता करता हूं। वे भी मुझसे एकदम सहज रहते हैं। वे अब भी मेरा सम्मान करते हैं। और हम एक-दूसरे की सेवा में लगे रहते हैं। मैं समझ गया कि सम्मान पद से नहीं बल्कि अपने स्वभाव से मिलता है। जिसमें थोड़ी भी मानवीयता होगी उसे सारी दुनिया आदर देगी। मैं पहले भी संतुष्ट था आज भी संतुष्ट हूं क्योंकि मेरे लिए मानवता सबसे बड़ी चीज है। 

दुख तो उन्हें होता है जो पद के अभिमान में चूर होते हैं। 

सिकंदर इस जवाब से बेहद प्रभावित हुआ। उसे लगा कि उसने सेनापति को समझने में भूल की है। उसे अपने फैसले पर पश्चाताप हुआ। उसने उसे फिर से अपना सेनापति बना लिया। 

Monday, December 3, 2018

किसान का खरबूज

स्वामी श्रद्धानंद अपने कुछ शिष्यों और दर्शनार्थ आए भक्तों के साथ बैठे हुए थे। 

भक्त अपने साथ लाए फल-फूल और मिठाइयां आदि स्वामी जी को भेंट कर रहे थे। स्वामी जी हमेशा की तरह फल काटकर उसे प्रसाद के रूप में वहां उपस्थित लोगों को बांट रहे थे। 

तभी एक बुजुर्ग किसान अपने खेत का एक खरबूज लेकर आया। उसने स्वामी जी से उसे खाने का अनुरोध किया। स्वामी जी ने उसका अनुरोध स्वीकार कर खरबूज को काटा और उसकी एक फांक खा ली। 
फिर तो उन्होंने बाकी खरबूज भी एक-एक फांक काट कर पूरा खा लिया। 

उनका यह व्यवहार भक्तों को थोड़ा अटपटा लगा पर वे चुप रहे। पर वह किसान काफी खुश होकर चला गया। उसके जाने के बाद एक भक्त ने पूछा- स्वामी जी, क्षमा करें। एक बात पूछना चाहता हूं। आप तो हर किसी के फल को प्रसाद की तरह बंटवा देते हैं पर आपने उस किसान के खरबूज को प्रसाद की तरह काटकर क्यों नहीं बांटा? 
स्वामी जी बोले- प्रिय भाई, अब क्या बताऊं, वह फल बहुत फीका था। किसी को भी पसंद नहीं आता। अगर मैं इसे भक्तों में बांटता तो मुझे ही अच्छा नहीं लगता और अगर उस किसान भाई के सामने ही इसे फीका कह देता तो उस बेचारे का दिल ही टूट जाता। वह बड़े प्रेम से उसे मेरे पास लाया था। उसके स्नेह का सम्मान करना आवश्यक था। खरबूजे में उसके स्नेह के अद्भुत मधुर रस को मैं अब तक अनुभव कर रहा हूं। 

यह सुनकर सभी भक्त स्वामी जी के प्रति श्रद्धा से भर उठे। 

Tuesday, November 27, 2018

आधुनिक देशभक्ति और उसकी सच्चाई

देशभक्ति एक भावनात्मक विचार जरूर है जो राष्ट्रप्रेम की भावना को प्रबल करता है।

विकसित राष्ट्र किसी एक नेता, दल या विचारधारा द्वारा रातों रात पूर्ण होने वाला दिवा स्वप्न न होकर एक अनवरत प्रयास है जो दशकों तक सतत रूप से किया जाना चाहिए।

विकसित राष्ट्रों में भी भयंकर खामियाँ हैं और वह भी सम्पूर्ण नहीं हैं।

यह कुछ उस प्रकार का कथानक अपनी लिखा है की पिताजी दिन रात मेहनत कर दो रोटी का इंतजाम कर रहे हैं और वामपंथी लड़का उनके काम में सहयोग न कर उन्हें खाली बैठा उलाहने देता रहे और उदाहरण में अपने सम्पन्न पड़ोसी को प्रस्तुत करे की देखिए अमुक के पिताजी ने उसे हार्ले मोटरसाइकिल और बीटल कार दिलवाई है, घूमने के लिए इस बार स्विट्जरलैंड गए थे।

पर उदाहरण गिनाते हुए वह लड़का यह भूल जाता है की पिताजी ने उसकी नौकरी लगवाने के, काम धंधा लगवाने के सतत प्रयास किये। पर लड़के का शग़ल था की उसे एक बड़े से केबिन में बैठ कर साहब वाली नौकरी करनी है, जिसमें उसके पास नौकर चाकर सब हों, पर उसे ये भान नहीं है की काम धंधा और रोजगार उसकी काबिलियत के अनुसार ही मिल सकता है। और उसके पिताजी की इतनी हैसियत नहीं की वो उसे कोई बड़ी फैक्ट्री खुलवा कर दे सकें।

यहाँ पिताजी मतलब राष्ट्र और पुत्र मतलब निठल्ली जनता से है।

बिल्कुल मैं एक हज़ार करोड़ का स्वामी बनते ही बेहतरीन जीवन शैली जियूँगा, पर एक हजार करोड़ का स्वामी अपने प्रयासों से बनूँगा। इस जीवनशैली को जीने के लिए प्रयास करूंगा अपनर दम पर या अपने पिता का सहयोग करके।

मैं उसके बाद विदेश में भी बस सकता हूँ, पर उसके अनेकोनेक कारण है, अगर वह कारण दूर किये गए होते तो व्यक्ति बाहर की जीवनशैली के प्रति आकर्षित न होता।

1. जनसंख्या विस्फोट :- अधिक जनसंख्या के कारण यहाँ शायद उस तरह शहरों का रख रखाव संभव नहीं जो शायद कुछ विकसित कम आबादी के देशों में संभव हो।

2. मूलभूत सुविधाएं जैसे सड़क, सामुदायिक जगहें।

देश के प्रति निष्ठा और प्रेम विदेश में रहने वाले भारतीयों के मन में कहीं ज्यादा है अगर उनकी तुलना हम उम्र खालिद और कन्हैया सरीखों से करें तो।

देशभक्ति एक ऐसा भावनात्मक विचार है जिसके चलते नागरिको को ये बोल कर दबाने का प्रयास होता आया है कि वे विकसित देशो के मुकाबले कमजोर राष्ट्र के नागरिक हैं इसलिए उन्हें बेहतर जीवन शैली , जीवन सुरक्षा इत्यादि का भरोसा फिलाल नहीं दिया जा सकता। पर नागरिक होने के नाते पूर्ण निष्ठा रखें , समय पर कर चुकाते रहें।

लेकिन अक्सर पढ़े-लिखे, संपन्न नागरिक जो अच्छा कमा रहे हो , वो इन भावनात्मक जाल में नहीं फंसते और विदेशों की ओर रुख कर लेते हैं। कई तो जैसे अक्षय कुमार की भांति रोजगार यहां से लेते हैं और नागरिकता कनाडा की रखते हैं। क्यूंकि देशभक्ति का आकलन उनके नज़रिये से भिन्न होने लगता है , वो बेहतर लाइफ स्टाइल पर व्यय करने की छमता रखते हैं फिर देशभक्ति जैसे शब्दों की परवाह उनके लिए कोई मायने नहीं होती और भारत की दयनीय स्तर को कोस कर निकल लेते हैं।

मैं तो कहता हूँ जोशी जी अगर १००० करोड़ के स्वामी बने तो उनका पहला स्वप्न होगा एक आलीशान लाइफ स्टाइल जीना , इसकी पूर्ति के लिए वे इस धरा पर बेहतर से बेहतर जगह का चुनाव करेंगे और  देशभक्ति टाइप शब्दों की परवाह नहीं करेंगे। वो शायद यहाँ के नागरिक भी नहीं रहेंगे।  लगभग यही स्वप्न सभी देखते हैं।       

इसलिए देशभक्ति को में धैर्य और निष्ठा बनाये रखने हेतु समझौते शब्द की तर्ज़ पर देखता हूँ , आम नागरिको के लिए ये शब्द किसी शोषण से कम नहीं। उनके हक़ को दबाने का जरिया है 'देशभक्ति'।

लोकतंत्र : हिन्दुस्तान की एक बिवंडना

जिस तरह हर बच्चा अपने माँ बाप से पूर्णतया संतुष्ट नहीं होता उसी तरह दुनिया में कोई भी देश सम्पूर्ण नहीं होता, और किसी देश की जनता कभी संतुष्ट नहीं होती।

पर इसका मतलब यह नहीं की सड़कों पर असंतुष्टि, पड़ोसियों के समर्थन कर जाहिर की जाए।

माँ बाप से असंतुष्टि जाहिर करने के लिए चौराहे पर न उन्हें गाली दी जाती है और न पड़ोसी को अपना माँ बाप बना लिया जाता है।

दरअसल हिन्दुस्तान का लोकतंत्र अधकचरा है जो अपरिपक्व हिंदुस्तानियों के हाथ में बंदर के उस्तरे के समान है।

हिन्दुस्तान में आदमी अपने अधिकारों से भली भाँति परिचित है परंतु कर्तव्यों के प्रति विमुख।

जीवनशैली उच्च स्तर की उसी की होगी जो प्रयास करेगा। घर बैठे अधिकारों की पीपणी बजाने से कुछ नहीं होगा। जिस देश की जनता कर्जमाफी, सब्सिडी, आरक्षण, भत्ते, पेंशन इत्यादि को सहूलियत न मान कर अधिकार मान बैठे वो जनता कर्तव्यविमुख हो जाती है और कभी सुखी नहीं हो सकती।

हिन्दुस्तान ने आश्रित पैदा किये हैं, कभी नागरिकों को सक्षम बनाने का प्रयास ही नहीं किया।

और जो सक्षम बनाने का प्रयास करता है उसे लोग पसंद नहीं करते। देश ने बाबू और नौकरी करने वाले नौकर पैदा किये, उद्यमी बनाने के प्रयास नहीं किये।

इसलिए यह देश आश्रितों क् बन गया है, आश्रयदाताओं क् घोर अकाल है।

देश अपने लोगों को रोटी (रोजगार) की जुगाड़ दे पाने में सक्षम नहीं, और वह देश अपने प्रति निष्ठा की उम्मीद करे। ये बेहद घटिया किस्म का प्रोपेगंडा बनाया जा चुका है एशियाई देशो में।

देश के प्रति निष्ठा तभी होनी चाहिए जब वह आपकी समस्याओं को लेकर गंभीर हो। बेमतलब की देशभक्ति की पीपनी बजाने से नागरिक अपना ही नुक्सान कर रहे। सबसे ऊपर मानयता देना होगा कि क्या जनता खुशहाल है, जीवन शैली उच्च स्तर की हुई ? अगर नहीं तो आज के भारत और तब के भारत में कोई फर्क नहीं। उसकी जयकार करना व्यर्थ है।